रात की ठंडी हवा दिल्ली की उस पुरानी हवेली में घुस रही थी, जहाँ परिवार की सारी रौनक एक छत के नीचे सिमटी हुई थी। चन्दन उस रात सो नहीं पा रहा था। उसका मन बेचैन था, जैसे कोई अनजानी आग उसके सीने में सुलग रही हो। वह अपनी पत्नी के भाई की शादी में आया था, लेकिन अब यहाँ रुकना मजबूरी बन गई थी। बर्फीली सर्दी की वजह से ट्रेनें रद्द हो गई थीं, और घर वापस जाना नामुमकिन। हवेली का वो पुराना कमरा, जहाँ वह अकेला लेटा था, दीवारों से ठंडक चिपक रही थी। बाहर बरामदे में हल्की-हल्की बातें सुनाई दे रही थीं, लेकिन चन्दन का ध्यान कहीं और था—सारिका पर।
सारिका, उसके साले की बीवी। वह पहली बार मिली थी शादी में, लेकिन उसकी आँखों में वो चमक, वो मुस्कान, चन्दन को अंदर तक हिला गई थी। वह करीब तीस साल की होगी, गोरी चिट्टी, लंबे बाल जो कमर तक लहराते थे। उसकी साड़ी उसके बदन पर ऐसे लिपटी रहती थी जैसे कोई गुप्त राज़ छिपा रही हो। चन्दन ने खुद को कई बार रोका था, लेकिन उसकी नजरें बार-बार उस पर ठहर जातीं। “यह गलत है,” वह सोचता, “वह मेरी साली की तरह है, परिवार की इज्जत का सवाल है।” लेकिन दिल कहाँ मानता है? रात गहराती जा रही थी, और ठंड बढ़ती जा रही थी। चन्दन ने कंबल ओढ़ा, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। अचानक दरवाजे पर हल्की खटखटाहट हुई।
“कौन?” चन्दन ने धीमी आवाज में पूछा, दिल की धड़कन तेज हो गई।
“जीजू, मैं सारिका।” आवाज आई, नरम और थोड़ी कांपती हुई। चन्दन उठ बैठा, दरवाजा खोला तो सारिका खड़ी थी, शॉल लपेटे, चेहरे पर हल्की मुस्कान लेकिन आँखों में कुछ अनकहा। “क्या हुआ? इतनी रात को?” चन्दन ने पूछा, अपनी आवाज को संभालते हुए।
“जीजू, मुझे नींद नहीं आ रही। घर में सब सो गए हैं, लेकिन ठंड बहुत है। क्या मैं थोड़ी देर यहाँ बैठ सकती हूँ? बातें करेंगे।” सारिका ने कहा, उसकी आँखें नीची थीं, लेकिन चन्दन को लगा जैसे वो आँखें कुछ और कह रही हों। वह हिचकिचाया, लेकिन “आओ” कहकर दरवाजा खोल दिया। कमरे में हल्की रोशनी थी, एक छोटा लैंप जल रहा था। सारिका अंदर आई, दरवाजा बंद किया और बिस्तर के किनारे बैठ गई। चन्दन भी उसके पास बैठ गया, लेकिन दूरी बनाए रखी।
कमरा छोटा था, पुरानी दीवारें, लकड़ी का फर्श जो ठंड से चरमरा रहा था। बाहर से कुत्तों की भौंकने की आवाज आ रही थी, लेकिन अंदर सन्नाटा था। सारिका ने शॉल कसकर लपेटा, “जीजू, आपकी शादी को कितने साल हो गए?” उसने पूछा, बात शुरू करने के लिए। चन्दन ने जवाब दिया, लेकिन उसका मन कहीं और था। सारिका की खुशबू, वो हल्की सी परफ्यूम की महक, कमरे में फैल रही थी। वह सोच रहा था, “कितनी खूबसूरत है ये। उसके होंठ, इतने नरम लगते हैं।” लेकिन वह खुद को कोसता, “चन्दन, यह तेरे साले की बीवी है। रिश्ते की मर्यादा रख।”
बातें चलती रहीं—परिवार की, शादी की, दिल्ली की सर्दी की। लेकिन धीरे-धीरे बातें व्यक्तिगत होने लगीं। सारिका ने कहा, “जीजू, आपकी पत्नी कितनी लकी हैं। आप इतने हैंडसम हैं, केयरिंग।” चन्दन हँस दिया, लेकिन अंदर एक लहर उठी। “तुम भी तो बहुत सुंदर हो, सारिका। तुम्हारा पति सौभाग्यशाली है।” उसने कहा, और नजरें मिलीं। वो पल, वो नजरें टकराने का पल, जैसे समय रुक गया। सारिका की साँसें तेज हो गईं, चन्दन को लगा उसके दिल की धड़कन सुनाई दे रही है। वह करीब सरक गई, अनजाने में। चन्दन का हाथ उसके हाथ से छू गया, और दोनों ठहर गए।
“जीजू, मुझे ठंड लग रही है,” सारिका ने धीरे से कहा, उसकी आवाज में एक कंपन था। चन्दन ने अपना कंबल उसके कंधों पर डाला, लेकिन उसका हाथ उसके कंधे पर रुक गया। सारिका ने आँखें बंद कर लीं, जैसे वो स्पर्श उसे अच्छा लग रहा हो। चन्दन का मन उथल-पुथल था। “यह गलत है, लेकिन इतना अच्छा क्यों लग रहा है?” वह सोचता। धीरे से उसने अपना हाथ हटाया, लेकिन सारिका ने पकड़ लिया। “रहने दो, जीजू। गर्माहट अच्छी लग रही है।” उसने कहा, और चन्दन के करीब आ गई। अब他们的 बदन छू रहे थे, कमरे की ठंड में वो गर्माहट जैसे आग की तरह फैल रही थी।
रात और गहरा गई। बातें कम हो गईं, लेकिन साँसें तेज। चन्दन ने सारिका की आँखों में देखा, वो आँखें अब शर्म से नहीं, इच्छा से भरी थीं। “सारिका, हमें नहीं करना चाहिए,” चन्दन ने कहा, लेकिन उसकी आवाज कमजोर थी। सारिका ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया, “जीजू, बस थोड़ी देर। कोई नहीं जानता।” उसकी साँसें उसके गले पर लग रही थीं, चन्दन का शरीर सुलग उठा। वह जानता था यह रिश्ते की सीमा लांघना है, लेकिन वो आकर्षण, वो चाहत, उसे रोक नहीं पा रही थी। धीरे से उसने सारिका के चेहरे को ऊपर किया, और उनके होंठ करीब आए। पहला चुंबन, हल्का सा, लेकिन जैसे बिजली दौड़ गई। सारिका की आह निकली, और वो और करीब आ गई।
कमरे में अब केवल उनकी साँसों की आवाज थी। चन्दन ने सारिका को अपनी बाहों में लिया, उसकी साड़ी का पल्लू सरक गया। उसका बदन, इतना नरम, इतना गर्म। “जीजू, मुझे आपकी जरूरत है,” सारिका ने फुसफुसाया। चन्दन का मन अब नहीं मान रहा था। उसने सारिका के होंठों को चूमा, गहराई से, जैसे सालों की प्यास बुझा रहा हो। सारिका के हाथ उसके सीने पर घूमने लगे, उसकी शर्ट के बटन खोलने लगे। चन्दन ने उसके ब्लाउज को छुआ, वो नरम उभार, जो साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। “सारिका, तुम्हारी चूची कितनी मुलायम है,” चन्दन ने कहा, और सारिका शर्मा गई लेकिन करीब आ गई।
वे अब बिस्तर पर थे, कंबल के नीचे। चन्दन ने सारिका की साड़ी उतारी, धीरे-धीरे, हर पल को महसूस करते हुए। उसका पेटीकोट, उसकी जांघें, सब कुछ खुल रहा था। सारिका की आँखें बंद थीं, लेकिन उसके होंठ मुस्करा रहे थे। “जीजू, छुओ मुझे,” उसने कहा। चन्दन का हाथ उसकी चूत पर गया, वो गीली थी, गर्म। “तुम्हारी चूत कितनी गर्म है, सारिका।” चन्दन ने कहा, और उंगली से सहलाया। सारिका की सिसकारी निकली, “आह, जीजू।” वो उसके लंड को छू रही थी, जो अब सख्त हो चुका था। “आपका लंड इतना बड़ा है,” उसने कहा, और सहलाने लगी।
तनाव बढ़ता जा रहा था। चन्दन ने सारिका को नीचे लिटाया, उसके ऊपर आ गया। उनका बदन एक-दूसरे से चिपक रहा था, पसीने से तर। “सारिका, मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ,” चन्दन ने कहा। सारिका ने हाँ में सिर हिलाया, “हाँ जीजू, चोदो मुझे।” चन्दन ने अपना लंड उसकी चूत पर रखा, धीरे से दबाया। सारिका की चीख निकली, लेकिन वो खुशी की थी। “आह, कितना मोटा है आपका लंड।” वे अब एक लय में थे, चन्दन अंदर-बाहर कर रहा था, सारिका की गांड पकड़कर। “तुम्हारी गांड कितनी गोल है,” चन्दन ने कहा। रात भर ये सिलसिला चला, कभी धीरे, कभी तेज। सारिका की सिसकारियाँ, चन्दन की आहें, कमरे में गूँज रही थीं।
सुबह होने से पहले, वे थककर लेटे थे। सारिका चन्दन के सीने पर सिर रखकर लेटी थी। “जीजू, यह रात कभी भूलूँगी नहीं,” उसने कहा। चन्दन ने उसे चूमा, लेकिन मन में अपराध बोध था। “हमने गलत किया, लेकिन इतना सही लगा।” वे जानते थे यह गुप्त रहेगा, परिवार की मर्यादा बनी रहेगी। लेकिन वो रात, वो चाहत, हमेशा याद रहेगी।



